Thursday, July 5, 2007

सहरा सा लगता है


घड़ी की सुई चल रही है ,
समय क्यों ठहरा सा लगता है।
पाबन्दी कोई नहीं है फिर,
हरदम क्यों पहरा सा लगता है।
चीख -चीख कर बोल रही हूँ ,
हर मानव क्यों बहरा सा लगता है।
चुल्लू भर पानी देखूं तो ,
मुझे क्यों गहरा सा लगता है।
आंगन मैं खड़ा ताड़ का पेड ,
मुझे क्यों लहरा सा लगता है ।
तारों के झुरमुट के पीछे ,
चांद का टुकडा आज
मुझे क्यों सहरा सा लगता है....

पूनम अग्रवाल

4 comments:

प्रवीण परिहार said...

"चीख -चीख कर बोल रही हूँ ,
हर मानव क्यों बहरा सा लगता है।"

बहुत बढीया, पूनम जी

Anonymous said...
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Poonam Agrawal said...

Dhanyavad Praveenji!!

roshen said...

Mam ur poems are indeed full of wisdom and poetry in equal tones... wonderful write on... u could try publishing them...