Monday, July 13, 2009

एक नजारा


ट्रेन के डस्टबिन के पास
मैले -कुचेले फटेहाल
वस्त्रों से अपना तन ढकती ,
गोद में स्केलेटन सा
बिलखता बच्चा थामे ,
डालती है अपना हाथ
डस्टबिन में वो ।
कचरे के बीच
बचे -खुचे खाने से भरी
एक थाली
ले आती है चमक
उसकी आँखों में।
इसपर भी चखती
अपनी उंगली से
बची-खुची दही-रायता।
फ़िर भरती है
बिनी हुई कटोरियों में
वोही झूठन ....
शायद घर पर
बीमार बूढी माँ
के लिए है वो सब ।
रोते बच्चे को
सूखे स्तन से
लगाती है जबरन ।
बटोरकर आशा
ट्रेन से
उतर जाती है
अगले पड़ाव पर ।
वाह रे भारत देश !
भारत की ये भारती !

पूनम अग्रवाल ......

63 comments:

राज भाटिय़ा said...

एक सचा चित्र भारत का यह भी है, बहुत सुंदर चित्र खींचा आप ने इस कविता के रुप मै.
धन्यवाद

SAHITYIKA said...

hakikat ko kavita ka roop aapne khoob diya hai..
lekin it happened in all countries..
no only in India.. so i dont agree with last lines.

Science Bloggers Association said...

शानदार अभिव्‍यक्ति।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

ज्योति सिंह said...

ek sachchi tasveer in shabdo ne jhalka diya ,bahut khoob likha hai .

"लोकेन्द्र" said...

यही तो दुःख है आज का......... जो आपने ने प्रस्तुत किया वो भारत का चेहरा है....... और India में तो कईयों के pet full कैलोरी का खाना खाते है......

creativekona said...

पूनमजी ,
भारत की असली तस्वीर अIपने खींची है बहुत सरल सहज कविता के माध्यम से ...बहुत गहरे तक दिल को छू गयी आपकी ये कविता .
हेमंत कुमार

abhay said...

jab bhi kabhi man udaas hota hain ya koi kaam nahi hota hain ,lagta hain main bahiut jyada presha hu
tab main ek hi song sunta hu
duniya main kitna gam hain ,mera gam kitna kam hain
logo ka gam dekha to main apna gam bhul chala
main sochta hun,un desbasiyo k baare main jinhe,ek bakt ka bhi khana naseeb nahi hota hain,main sochta hu ,un desbasiyo ke baare main,jo apne tan ko pura sahi nahi dhak sakte hain,srd hawaon main
main sochta hun ,un desbasiyo ke baare main ,jinhe jeene ki tammna hain,par uske pet ki bhuk,bina vastro k tan is samaaj se use alag kar deti hain
bahut sajeev kavita likhi hain aapne poonam ji

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

वाह रे भारत देश !
भारत की ये भारती !

हृदय को तार तार करती कविता.


ऐसी अभिव्‍यक्ति और शव्‍दसामर्थ के लिये बहुत बहुत धन्‍यवाद.

आनन्द वर्धन ओझा said...

पूनमजी,
आपकी इस कविता ने चिंतन के तल पर झकझोरा है. आपकी लेखनी से जो चित्र उभरा है, उसे असंख्य लोगों ने देखा होगा, लेकिन भारती की इस दशा-मनोदशा को आपने शब्द दिए. सरल-सहज प्रवाह और शब्दों में यह रचना मर्म तक पहुँचती है ! इस करुण शब्द-चित्र के लिए बधाई देना प्रीतिकर नहीं लगता.
आपका मेरे ब्लॉग पर आना भी बहुत दिनों से नहीं हुआ न ?

dr.amarjeet kaunke said...

jeevan yatharath ko apne bahut hi sahaj dhang se apni kavita ne piroya hai..aise vishe aaj ki kavaita me nadaard nahi to bhut kam dekhne ko milte hain....dr.amarjeet kaunke

www.amarjeetkaunke.blogspot.com

dwij said...

आपकी सम्वेदना को नमन
.
अभिव्यक्ति भी कमाल की है.

MUFLIS said...

saarthak rachnaa
sachche alfaaz
ek prativimb
ek tamaachaa

waah re Bharat desh...
Bharat ki ye aarti....

sach kehne ke iss hausle par abhivaadan svikaareiN.

---MUFLIS---

Harsh said...

kavita aur blog dono achcha laga bas lekhan jaari rakhiye..........

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

सुन्‍दर टैम्‍पलेट के लिये बधाई.

ajay saxena said...

पूनम जी ..आपकी संवेदना लाजवाब है ...लेकिन यह लोग ऐसे ही रहना पसंद करते है ...काम नहीं करना चाहते ..वर्ना स्टेशन के आस पास किसी दूकान या होटल में झाडू पोचा से लेकर बर्तन माजने का काम कर स्वाभिमान और इज्जत की दो रोटी तो खा ही सकते है ....

raj said...

mera bharat mhaan.....boht touching kavita...

Sachin Verma said...

Nice read

Vijay Kumar Sappatti said...

amazing poem ji , waah kya khoob likha hai , man ko choo gayi hai aapki rachna ...ye desh ab banana country ban gaya hai ... lekin kya kare . apna desh hai ..

aabhar

vijay

pls read my new poem "झील" on my poem blog " http://poemsofvijay.blogspot.com

मस्तानों का महक़मा said...

bahut hi khoobsurat vichar hai aapke...
kavita me shbdo ka utar achcha laga
jay ho.

मस्तानों का महक़मा said...

bahut hi khoobsurat vichar hai aapke...
kavita me shbdo ka utar achcha laga
jay ho.

मस्तानों का महक़मा said...
This comment has been removed by the author.
मस्तानों का महक़मा said...
This comment has been removed by the author.
Ek Shehr Hai said...

बहुत नज़दीकी का अहसास उभरता है-

एक सवाल जानना चाहता हूँ मैं,

ऐसा क्या है हमारे आसपास जिसपर बोलने के लिये और लिखने के लिये हमें बने - बनाये ढाँचों से बाहर जाकर शब्द तलाशने पड़ते हैं?

योगेश स्वप्न said...

mera bharat mahaan.

रचना गौड़ ’भारती’ said...

आज़ादी की 62वीं सालगिरह की हार्दिक शुभकामनाएं। इस सुअवसर पर मेरे ब्लोग की प्रथम वर्षगांठ है। आप लोगों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष मिले सहयोग एवं प्रोत्साहन के लिए मैं आपकी आभारी हूं। प्रथम वर्षगांठ पर मेरे ब्लोग पर पधार मुझे कृतार्थ करें। शुभ कामनाओं के साथ-
रचना गौड़ ‘भारती’

विपिन बिहारी गोयल said...

उत्तम रचना के लिए साधुवाद

तेज धूप का सफ़र

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

वाह रे भारत देश !
भारत की ये भारती !

मार्मिक रचना के लिए बधाई।

Shubhali said...

very nice poem ..a truth...

भूतनाथ said...

badhiya aur samvedansheel......!!

JHAROKHA said...

Poonam ji,
Apakee yah ytharthvadee kavitaa dil ko gaharai tak chhoo gayee....bharat kee asalee tasveer...
Poonam

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

Very true expression of real India.You realised it and reminded aswell.
My heartly congratulations.
Dr.Bhoopendra

शरद कोकास said...

मै सोच रहा था अब तक नई कविता यहाँ आ गई होगी !!! क्या बात है कवि को इतना आलसी नही होना चाहिये । वैसे मै भी थोड़ा तो हूँ ही । इस कविता मे आखरी पंक्ति मे कुछ फेर बदल हो सकता है क्या ? -शरद कोकास दुर्ग छ.ग.

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

अच्छी प्रस्तुति....बहुत बहुत बधाई...
मगर यह भारत की सच्ची तस्वीर है,मै इससे सहमत नहीं.....

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

Sach kaa aaina hai aapki rachnaa.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

ज्योति सिंह said...

wah re bharat desh ,bharat ke ye bharati .kya baat kahi man ko chhoo gayi .ek rota such ,ek kadahata such .is rachana se ek khabar dhayan me taza ho gayi kuchh din pahale ek hotel me sansado ke rukne ka bil 1-crore 75 lakhs rupees aaya jo sarkari khate me gaya .is asamanta par aapki aakhri line jahan me aa gayi .janta ki kurshi aur janta fatehal ...

Amish said...

Wow! Got my hands on your blog today only and believe me it inspired me a lot be a blogger myself, which I'm gonna do soon..
The given poetry reminds me of the vivid picture of the songs >> Another Day in Paradise - by Phil Collins..
Let's see if write something as well by getting inspired from this poem..

अमित said...

achchha hai poonam ji| samvedan ke star par ek achchhi rachana ke liye badhaai|

Kaalki said...

hey dear.....u r too good with the usage of words !!
really loved goin thru ur poems n rantings.....surely i'll come again n again at ur blog.....

I was pretty concerned that whether we r having ny good Hindi poets n writers or not but ma dear u've removed all ma doubts.....
U r too good !!

Sonali said...

bahut khub...

रचना गौड़ ’भारती’ said...

भारत का एक कटु सत्य। कविता जी उठी आत्मा में संताप बन कर। बहुत बहुत बधाई।

RC said...

:-)

Touching .. indeed ...!

RC

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

पूनम जी
भूख की शिद्दत बदल देती है फितरत सब्र की
''वरना मैं और उडके आता एक दाने के लिये''
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

Jogi said...

its amazing one !!!beautifully written

rahul kumar said...

nice

Apanatva said...

aap hai kanha in dino...... ?
apane hee blog se ye kaisee narazee....... ?

Parul said...

bahut sundar!

makrand said...

great lines
vision is upto grass root level

GS said...

उम्‍दा रचना.

आज के दौर में हमें ऐसी ही रचनाओं की आवश्‍यकता है जो हमें बदलाव के लिए प्रेरित करें.
जब तक देश का हर नागरिक बुनियादी सुविधाएं नहीं प्राप्‍त कर लेता और गरिमा के साथ जीवन नहीं जी पाता, तब तक भारत की 'महानता' पर गर्व करना निरर्थक है.

Dr. shyam gupta said...

सवाल यह नहीं ये होरहा है, यह तो आज़ादी के ६० साल से गाया जारहा है, प्रश्न है --कौन जिम्मेदार है????????? उस पर कविता लिखी जाय--समाधान पूर्ण।

एक कविता अर्थहीन , श्याम – शवेत तथा मौन । said...

बहुत ही अच्छा !

makrand said...

great lines

Yatish said...

बहुत सुंदर, यथार्थ चित्रण


कभी अजनबी सी, कभी जानी पहचानी सी, जिंदगी रोज मिलती है क़तरा-क़तरा…
http://qatraqatra.yatishjain.com/

saurabh said...

hindustan ka ye chitra dikakar apne hamen jagane ka kam kiya ...
ham itne andhe ho gaye hain ki apne aram aur apne darbe se nikal kar soch hi nahi pate
apna hindustan kaise aisa ho sakta hai/ hamare rahte hue/...
bahut hi marmik rachna.

aarkay said...

वास्तविकता का बोध कराती एक सुंदर रचना . आपने तो अर्श से फर्श पर पटका दिया !

Dikshya said...

ye drishya behad bhabhuk kardeta hai
aur kavita ke roop me aap ne sachhai ko bayan kiya hai

राजेश उत्‍साही said...

पूनम जी आपकी संवेदना ने प्रभावित किया।

boletobindas said...

सालो पुराना सच आज भी छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में यथावत। क्या ये लोग मनमोहनी व्यवस्था में किसी पायदान पर पहुंचेंगे भी।

एक सवाल सार्वजनिक.....क्या हम खुद चाहे छोटी सी पहल करने में सक्षम लोग....क्या कुछ करने के लिए खुद पहल करेंगे। या पहल करने वालों का साथ देंगें। नहीं न....

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

Poonam ji ,.aapka blog to behad khubsoorat hai kavi ki kalpana ki tarah.
Man ko sparsh karney wali kavita hetu mera aabhar ,dhanyavad,best wishes.
Regards,
dr.bhoopendra

Dr.Bhawna said...

दिल को झकझोर देने वाली अभिव्यक्ति...

'साहिल' said...

बहुत ही मार्मिक कविता है........लिखते रहिये.....

Deepesh said...

nice one ....keep it up

web hosting india said...

I enjoyed to read this blog. It's great stuff. Each and every day your blog having some different topic.

Ramakant Singh said...

BEAUTIFUL POST WITH DEEP FEEELINGS AND EMOTIONS AND SO BEAUTIFUL PAINTING.