Friday, November 16, 2007

वो एक सितारा


आसमां के तारों में वो एक सितारा
क्यों लगता है अपना सा।
पलकें बंद कर देखूं तो सब
क्यों लगता है सपना सा।


बाहें किरणों की पसरा कर वह
देख मुझे मुस्काता है।

बस वही सिर्फ एक सितारा
हर रोज मुझे क्यों भाता है।

आसमां के तारों में वो एक सितारा
क्यों लगता है अपना सा।


बादल की चादर के पीछे जब
वह छिप जाता है।
बिछड़ा हो बच्चा माँ से जैसे
इस तरह तडपाता है


आसमां के तारों में वो एक सितारा
क्यों लगता है अपना सा।
पलकें बंद कर देखूं तो सब
क्यों लगता है सपना सा। ....


- पूनम अग्रवाल .....

4 comments:

Me with my solitude said...

oh.........i've been away from internet for a long time........got time to read ur poem now...........
its so good,i cant express...............just waiting for next.....

Dr. RAMJI GIRI said...

"बस वही सिर्फ एक सितारा
हर रोज मुझे क्यों भाता है।"

बहुत ही सुन्दर और सहज अभिव्यक्ति है प्रेम-भाव की ,आपकी रचना में.

DR.ANURAG ARYA said...

kahi dil ke kisi khas hisse se likhi gayi hai.....aor mashallah kya chitr lagaya hai aapne.....

Viksit Khanna said...

आसमां के तारों में वो एक सितारा
क्यों लगता है अपना सा।
Really touching...please continue writing more of such poems in future...i wish you best of luck!!