Wednesday, May 21, 2008

भगवान् ( ईश्वर )


रोंदी मिट्टी का ढेर नहीं मैं ,
हवा के झोंके से उड जाऊँ ।
से भूमी हूँ मैं सम्पूर्ण -

बादल का एक टुकडा नहीं मैं,
बरस जाऊँ किसी आंगन में।
से गगन हूँ मैं अनंत-

मंद पवन का झोंका नहीं मैं,
उड़ा लाऊ कुछ तिनके ,धूल ।
से वायु हूँ मैं प्राण -रक्षक -

टिमटिमाते दिए की लों नही मैं,
बुझ जाऊँ दिए की बाती संग
से अग्न हूँ मैं दाहक -

झर झर
बहती धार नहीं मैं,
समा जाऊ किसी सरिता में.
से नीर हूँ मैं जीवन - दायक-

सम्पूर्ण स्राश्ती के हम हैं विधाता ,
मिलकर बनते हैं 'भगवान्'-
रूष्ट एक भी हो जाए फ़िर ,
मानव का नहीं है कल्याण ।

पंचतत्व हैं हम कहलाते '
हमसे हुवा सबका निर्माण।
सर्वत्र हमारी पूजा होती।
सम्पूर्ण जगत में हम विद्यमान।

पूनम अग्रवाल-



9 comments:

shahid said...

विचारों मैं परवाज़ और गहरे है जो साफ झलकती है ..जब कोई लिखना शुरू करता है टू मेरी नज़र मैं किसी एक के लिए लिखता है मगर बाद मैं वो पुरी दुनिया का कवि हो जाता है . और आप की इस कविता से झलकता है की आप अब दुनिया के लिए लिख रही हैं
बधाई

Me with my solitude said...

wow amazing combination of thoughts......could never think of it.....really mind blowing.

Anonymous said...

Amazing poem.. Belive me.. this is an award winning work..
Love
B2 :)

Anonymous said...

Tooooooooooo Goooooooooood.....Can't Beleive My Mother is such an Awsome Poet.......Simply Out of this world...Keep Writing this forever and i tell you...even Sky is not the Limit for you...Best Of Luck and Best wishes Always.....Viksit...

DR.ANURAG said...

bahut khoobsurat hai.....

DUSHYANT said...

waah badhaii

RIYA said...

the poem is simply outstandin...i cant believe that a person like me will like a poem......i just loved it....keep writtin it

Misha Agrawal said...

Amazing poem.. Belive me.. this is an award winning work..
Love
B2 :)

Anonymous said...

just love it